बीजापुर।एक समय नक्सली घटनाओं और संघर्षों की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले बीजापुर जिले में एक ऐसा गांव भी रहा है, जिसने डर और हिंसा से अलग अपनी पहचान मेहनत, पशुपालन और दूध की सफेदी से बनाई थी। यह गांव है मोदक पाल, जो बीते कई दशकों तक पूरे जिले में दूध, दही और घी के उत्पादन के लिए जाना जाता रहा। आज जब बीजापुर में डेयरी उद्योग ने किसी हद तक आकार ले लिया है, तब यह गांव अपने उस स्वर्णिम अतीत को याद कर रहा है, जब यहां की लगभग पूरी आबादी दूध व्यवसाय पर निर्भर थी।

मोदक पाल गांव की पहचान 1980 के दशक में उस समय बनी, जब बीजापुर जिले में डेयरी उद्योग नाममात्र का था। उस दौर में जिले में गिनती की एक-दो ही डेयरियां मौजूद थीं और संगठित दूध संग्रह की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी। ऐसे समय में मोदक पाल गांव ने अपने पारंपरिक ज्ञान, परिश्रम और पशुधन के सहारे न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि आसपास के कस्बों और बाजारों की दूध की जरूरत भी पूरी की। गांव के लगभग सौ फीसदी परिवार दूध व्यवसाय से जुड़े हुए थे। पशुपालन यहां सिर्फ आजीविका नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा था।गांव का हर आंगन पशुधन से भरा हुआ दिखाई देता था। गाय, बैल और बकरियों की मौजूदगी सामान्य दृश्य हुआ करती थी। सुबह तड़के जैसे ही सूरज की पहली किरण धरती पर पड़ती, गांव में चहल-पहल शुरू हो जाती। महिलाएं दूध दुहने में जुट जातीं और पुरुष ताजे दूध के बर्तन लेकर पैदल या साइकिल से कस्बों और आसपास के बाजारों की ओर निकल पड़ते। मोदक पाल के दूध की गुणवत्ता और शुद्धता की ऐसी पहचान बन चुकी थी कि ग्राहक गांव का नाम सुनते ही भरोसा कर लेते थे। दूध के साथ-साथ यहां का दही और घी भी बाजार में हाथों-हाथ बिक जाता था।

ग्रामीण बताते हैं कि उस समय दूध व्यवसाय से उन्हें सम्मानजनक आमदनी हो जाती थी। बच्चों की पढ़ाई, घर-परिवार का खर्च और सामाजिक जरूरतें इसी आय से पूरी होती थीं। गांव में गरीबी जरूर थी, लेकिन आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता भी थी। पशुधन को परिवार के सदस्य की तरह पाला जाता था। चारे की व्यवस्था, पशुओं की देखभाल और दुग्ध उत्पादन की परंपरागत तकनीकें पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहीं।लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। जैसे-जैसे बाजार का विस्तार हुआ, बड़े डेयरी ब्रांड और संगठित दुग्ध संग्रह केंद्र सामने आए। सरकारी नीतियों और नियमों का असर भी छोटे ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों पर पड़ा। दूध की कीमत तय करने में ग्रामीणों की भूमिका कम होती गई और बिचौलियों का प्रभाव बढ़ने लगा। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कम मुनाफे ने मोदक पाल के दूध व्यवसाय को धीरे-धीरे कमजोर करना शुरू कर दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि पशुओं के चारे की कीमतों में बढ़ोतरी, इलाज और देखभाल का खर्च तथा दूध के उचित दाम न मिलना सबसे बड़ी समस्या बन गई। पहले जहां दूध सीधे ग्राहकों तक पहुंचता था, अब वहां बड़े डेयरी नेटवर्क हावी हो गए। इससे छोटे उत्पादकों की आमदनी घटने लगी। कई परिवारों ने पशुधन बेचना शुरू कर दिया, तो कई ने इसे केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित कर लिया।इस बदलाव का सबसे बड़ा असर युवा पीढ़ी पर पड़ा। जो युवा कभी अपने माता-पिता के साथ दूध व्यवसाय में हाथ बंटाते थे, वे अब वैकल्पिक रोजगार की तलाश में गांव से बाहर जाने लगे हैं। कोई मजदूरी करने शहर जा रहा है, तो कोई छोटे-मोटे व्यापार या सरकारी योजनाओं की ओर उम्मीद लगाए बैठा है। दूध व्यवसाय, जिसने इस गांव को पहचान दी थी, अब युवाओं को भविष्य सुरक्षित नहीं लग रहा।
मोदक पाल गांव के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब गांव का नाम पूरे इलाके में सम्मान के साथ लिया जाता था। उनका कहना है कि अगर समय रहते ग्रामीण डेयरी को बढ़ावा देने के लिए ठोस पहल होती, तो आज हालात कुछ और होते। उनका मानना है कि पशुपालन आज भी गांवों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत साधन बन सकता है, बशर्ते सरकार और प्रशासन छोटे दुग्ध उत्पादकों को उचित समर्थन दे।
आज मोदक पाल गांव में पशुधन की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। जहां कभी हर घर में कई गायें और बकरियां हुआ करती थीं, वहां अब गिनती के ही पशु नजर आते हैं। गांव की पहचान बनाने वाला दूध व्यवसाय धीरे-धीरे इतिहास बनता जा रहा है। इसके साथ ही एक पूरी परंपरा, एक जीवनशैली और एक स्वाभिमानी आजीविका भी खत्म होने की कगार पर है।फिर भी गांव के कुछ परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे मानते हैं कि अगर स्थानीय स्तर पर दुग्ध संग्रह केंद्र, उचित मूल्य और प्रशिक्षण की व्यवस्था हो, तो मोदक पाल एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान हासिल कर सकता है। यह गांव सिर्फ दूध उत्पादन का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि इसने यह दिखाया कि संघर्षों से घिरे इलाके में भी मेहनत और ईमानदारी से नई पहचान बनाई जा सकती है।मोदक पाल की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों ग्रामीण समुदायों की है, जिनकी पारंपरिक आजीविका बदलते समय और नीतियों के दबाव में कमजोर होती जा रही है।








